सौतेली माँ की छवि खराब ही क्यो दिखाता हमारा ये समाज??

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Kajal Singh
Dec 03, 2020   •  21 views

-काजल सिंह

माँ तो माँ होती है । सगी हे या दूसरी हों। सौतेली शब्द जोड़कर घ्रणा का पात्र क्यों बनाना।सब कुछ जाने बिना ही उस एक शब्द से परख लेनो कौन सी किताब में लिखा, या ये कहा का नियम है बचपन से ही बच्चों की कहानियां लिजिए या समाज की सोच सब में दूसरी माँ की छवि क्रूर और षडयंत्रकारी ही दिखाई या बताई जाती! सिर्फ इतना कहना कम होगा यहा तक कि जितने समाचार में अगर सौतेली माँ का कही जिक्र आ भी गया तो वो ये ही होगा कैसे सौतेली माँ ने जुर्म किया या अपने सौतेले बच्चे को मारा। कभी गलती से भी किसी कि मुख से नही निकला होगा कि नही वो जो उनकी दूसरी मां है बड़ा खयाल रखती या किसी समाचार मे भी ये नही छपा कि दूसरी माँ, होते हुए भी कैसे बच्चे को कामयाबी की सीढ़ी तक पहुंचाया ।

नहीं भला सँमाजू ये क्यो करेगा?समाज होता ही इसलिए कि वो सबको देखकर ही परख लेगा कौन सही कौन गलत। ये तो हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है दूसरो पर टिप्पणी करना, उनकी छवि कैसी है ये तो समाज, ही तय करेगा । अब आप सोच रहे होगें! मैं कौन होती हूँ समाज पर, उंगली उठाने वाली मेरी छवि भी आपने बना ही ली होगी कि समझ है नही ,समाज कि बारे मे जानती नही , और सिखाने चली ।

मैं इस बात का स्पष्टीकरण आपको कुछ ही देर में बताउंगी की मै ऐसा लिख क्यो रही । यही शिर्षक क्यों चुना? तो चलिए वापस आते अपने शिर्षक सौतेला माँ की छवि को लेकर ।

देखिए वक्त सबका बदलता है सबका स्थिति कहलिजीए या अवस्था हमेशा एक जैसी नहीं रहती। क्या आपने कभी इस नजरिये से सोचा कि एक सौतेली माँ भी प्यार दे सकती?

जैसे ही सौतेली माँ का मैने यहाँ जिक्र किया, हमारे मन में एक ऐसी औरत की छवि आ जाती, जो अपने सौतेले बच्चों पर जुल्म करती है. मैं आज अपने इस आर्टिकल में पूरी कोशिश करूंगा की मैं कही जरा सी भी आपकी सोच बदल पाऊ हमारी सभी প্র

दूसरी माँओं कि छवि को लेकर । मैं यह स्वीकार भी करती हूँ कि दूसरी माँ द्वारा भी बच्चो को इतना ही प्यार मिल सकता है, जितना कि एक सगी माँ करती है। चलिए हम शुरुआत करते है विभिन्न नामों से जो हमारे समाज द्वारा सभी नई माँओं की दिए गए सौतेली; दूसरी आदि में किसे किस नाम से, पुकारते उसके पीछे छुपा भाव दर्शाते है। किसके पीछे अपनत्व है और कहा चिढ़न, समाज हमारा सौतेली की छवि पहले ही निर्धारित कर चुका! सौतेली का मतलब क्रूर या ,षडयत्रंकारी । पर क्या सब माँ एक जैसी होती? या सिर्फ नाम के थप्पा लगने से समाज का शिकार हो जाती । सिर्फ इसलिए क्योकि है तो वो माँ पर सौतेली, शब्द जुड़ गया तो गलत ही होंगी, क्या ऐसी सोच रखना उचित है?

कभी कभी दूसरी माँ एक की जैविक माँ से ज्यादा बेहतर माँ साबित होती क्या समाज उन जैसी अच्छी माँओं का उदाहरण नही स्थापित करना चाहिए। ऐसी माँओं की सराहना या उन्हें स्रेय नही देना चाहिए । हमेशा नकारात्मक भाव ही क्यों पैदा करना, जबतक नकारात्मक शक्ति को हटांएगे नही सकारात्मक भाव से अछूत ही रहेगें।

कभी कभी हम बिना किसी अनुभव के ही चीजो को ग्रहण कर लेते हैं । जैसे ही हमारे जहन में सौतेली माँ का विचार आता है बुरी माँ की छवि सिमने उभर आती है ।

मैं आपको कुछ इस तरह से अपनी बात स्पष्ट

करने की कोशिश करती हूँ। देखिए हर सिक्के के दो पहलू होते हैं जिसे हम कई बार देखना भूल जाते ,या अनदेखा कर देते हैं । हमारी सोच, कितनी ही नई माँओ को चोट पहुचाई । हम किसी के दर्द को तब तक नही समझ सकते या महसूस नहीं, कर पाते जब तक हम स्वयं उसकी जगह पर नहीं आ जाते । मै आपको उसी सिक्के का दूसरा पहलू दिखाने की कोशिश करुंगी । मैं उदाहरण द्वारा बात रख रही। मान लिजिए एक महिला एक लड़की की सौतेली माँ बन गई।अब अगर वह उसे किसी भी बात के लिए गई कुछ कहेगी तो उसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा। जैसे की देर रात की पार्टियो में जाना या छोटी पोशाक का पहनना , इन सब चीजो से अगर वह अपनी खुद की बेटी को रोकती तो कोई बात नही थी । सब कहते कि कितना ख्याल रखती है । लेकिन अब सबका नजरिया कुछ और ही है। भेदभाव करने वाली और स्वार्थी माँ कहकर उसे नीचा दिखाया जा रहा है । आप फर्क की ऊचाई देख रहे हैं । इन सबसे हमारी दूसरी माओ का जीवन कितना कष्टदायी हो सकता , हम अदांजा भी नहीं लगा सकते । अगली बार किसी के बारे मे अपनी राये बनाने से पहले सोचिएगा जरुर।

और मैं इसे द्रढ़तापूर्ण इसलिए स्वीकार करती हूं क्योंकि मेरी भी दूसरी माँ है, लेकिन वो सिक्के का दूसरा पहलू है । उम्मीद करती हू आप तक मेरा सन्देश पहुंचा होगा। जागरूक होइए!

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