चंद्रयान 2 - एक कहानी.....

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Debarpita Banerjee
Nov 01, 2019   •  11 views

भारत हमेशा से ही महाकाश में महत्वाकांक्षी देश रहा है। भारत की महाकाश- प्रेम गाथा तो तब ही शुरू हो गई थी जब 1950 में 'इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजे़शन' यानी इसरो का गठन हुआ था। तब से आज तक भारत ने महाकाश में कई बड़ी छलांगें लगाई हैं। आज इसरो को विश्व की 5 सबसे शक्तिशाली महाकाश परीक्षण संस्थानों में गिना जाता है। लेकिन यह उपलब्धि एक ही दिन में हासिल नहीं हुई है। इसके पीछे लगातार मेहनत तथा भारत के वैज्ञानिकों की दूरदर्शिता की बड़ी भूमिका है। भारत भविष्य में भी अनेक बड़े महाकाश परीक्षण करने की इच्छा रखता है। भारत 2022 तक अंतरिक्ष में अपना अंतरिक्ष- यात्री भी भेजना चाहता है। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण कदम है जीएसएलवी मैक 3 का सफल परीक्षण। इसी वर्ष जीएसएलवी मैक 3 को चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण के लिए इस्तेमाल किया गया था जो कि सफल रहा। अर्थात हम यह कह सकते हैं की चंद्रयान-2 कई दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट रहा है।

लेकिन भारत के लिए चंद्रयान-2 तक पहुंचने का सफर इतना आसान नहीं था। चन्द्रयान-2 की प्लानिंग तभी शुरू हो गई थी जब इसरो ने चंद्रयान-1 को प्रक्षेपित किया और वह मिशन सफल रहा था। इसरो ने 2008 में चन्द्रयान-1 को प्रक्षेपित किया था जो कई नज़रिए से ऐतिहासिक मिशन साबित हुआ था। इसी मिशन में पहली बार भारत ने अपनी स्पेस टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से चंद्रमा का परीक्षण किया था। इस मिशन की सबसे ऐतिहासिक कामयाबी यह थी कि चन्द्रयान-1 ने ही पहली बार चंद्रमा पर पानी के संकेत दिए थे। चन्द्रयान-2 के सहारे इसरो के वैज्ञानिक इसी सफलता को आगे बढ़ाना चाहते थे, पिछले बार सिर्फ ऊपर से परीक्षण किया गया था, इस बार चंद्रमा की सतह पर उतरने की बारी थी। लेकिन चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने के लिए जिस तकनीक की आवश्यकता पड़ती है वह तकनीक भारत के पास नहीं था।

सॉफ्ट लैंडिंग की तकनीक के ना होने के कारण भारत ने लैंडर खरीदने के लिए रूस की अंतरिक्ष संस्थान रोस्कॉसमॉस से समझौता किया। यह तय किया गया कि भारत चंद्रयान-2 के लिए ऑर्बिटर को विकसित करेगा तथा रोस्कॉसमॉस इस मिशन में इस्तेमाल होने वाले लैंडर और रोवर को तैयार करके 2013 तक भारत को सौंपेगा। मगर रूस समय पर लैंडर विकसित करने में असमर्थ रहा जिसके कारण इस मिशन को 3 साल तक आगे बढ़ा दिया गया। 2015 में रूस ने रोस्कॉसमॉस के पिछले मिशन के असफलता को देखते हुए चंद्रयान 2 मिशन से अपने-आपको अलग कर लेने की घोषणा की। अर्थात भारत के पास अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा था - खुद अपना लैंडर और रोवर विकसित करना।

यह कार्य बेहद कठिन इसलिए था क्योंकि कोई भी देश पहली बार में सॉफ्ट लैंडिंग कराने में सफल नहीं हो पाया है। लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। उन्होंने यह ठान लिया था कि वे चन्द्रयान-2 को अपने दम पर अंतरिक्ष भेजकर ही दम लेंगे। इस मिशन को थोड़ा और कठिन बनाने के लिए इसरो ने चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर उतरने का फैसला किया। इस हिस्से में इसरो से पहले विश्व के किसी भी देश ने उतरने की कल्पना तक नहीं की थी।

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चंद्रयान-2 के अंग :

चन्द्रयान-2 के निम्नलिखित तीन प्रमुख अंग हैं -

  1. ऑर्बिटर

  2. रोवर - प्रज्ञान

  3. लेंडर - विक्रम

क्योंकि इसरो ने पहली बार अपने खुद के टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से लैंडर को विकसित किया था इसलिए इस लैंडर का नाम इसरो के संस्थापक विक्रम साराभाई के नाम पर 'विक्रम' रखा गया। इसरो के वैज्ञानिकों के मुताबिक विक्रम को इस तरह से कोड किया गया था की वह अपने अंदर प्रज्ञान को छिपाकर उसे चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित पहुंचा सके। उसके बाद सौर्य-ऊर्जा के प्रयोग से प्रज्ञान खुद को चार्ज कर लेता और विक्रम के अंदर से बाहर निकल कर चंद्रमा की सतह का परीक्षण करता। इस परीक्षण के लिए चन्द्रयान-2 में कई हाईटेक पेलोड शामिल किए गए थे।

चंद्रयान-2 के पेलोड :

चन्द्रयान-2 मैं कुल 14 भारतीय पेलोड शामिल किए गए थे जिनमें से 8 ऑर्बिटर पर, 4 लैंडर पर तथा 2 रोवर पर शामिल थे। पहले यह तय किया गया था कि इस मिशन में किसी भी विदेशी पेलोड का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। लेकिन लाँच के 1 महीने पहले ही इसरो ने नासा से एक लेज़र रेट्रोरिफ्लेक्टर मंगवाया था जिसे लैंडर में शामिल किया गया था। इस पेलोड का प्रमुख कार्य चंद्रमा की सतह की लेज़र के मदद से परीक्षण करना था।

मिशन चंद्रयान 2 के अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक लक्ष्य थे, जैसे :

  • इस मिशन में पहली बार भारत जीएसएलवी मैक 3 जैसे शक्तिशाली रॉकेट का परीक्षण करने वाला था। यह परीक्षण अत्यंत सफल रहा था क्योंकि जीएसएलवी मैक 3 ने चंद्रयान को निर्धारित ऑर्बिट से भी आगे तक पहुंचा दिया था जिसके कारण चंद्रयान के ईंधन की बचत हुई थी। भारत के 2022 तक गगनयान को लांच करने के सपने को बल देने के लिए यह एक महत्वपूर्ण सफलता थी।

  • इस मिशन में भारत पहली बार अपने खुद के टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से लैंडर और रोवर को विकसित कर रहा था तथा पहली बार खुद के तकनीक के इस्तेमाल से चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग कराने के प्रयास कर रहा था।

  • इस मिशन में इसरो के वैज्ञानिकों ने विक्रम को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट उतारने के प्रयास किए थे। चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव चंद्रमा के सतह का सबसे कम-परीक्षित क्षेत्र है। इस क्षेत्र में आज तक कोई भी देश अपना लैंडर उतारने में सफल नहीं हो पाया है। लेकिन चंद्रमा का दक्षिण ध्रुव वैज्ञानिकों को हमेशा से ही आकर्षित करता आया है क्योंकि वैज्ञानिक यह मानते हैं कि इसी जगह पर पानी व बर्फ के मिलने के सबसे अधिक आसार हैं।

  • चन्द्रयान-2 में शामिल ऑर्बिटर मे ऐसे कई पेलोड हैं जो चंद्रमा की सतह की 3डी मैपिंग करने में सक्षम है। इससे वैज्ञानिकों को चंद्रमा की सतह पर मौजूद खनिज पदार्थों के परीक्षण करने में तथा भविष्य में किसी भी परीक्षण को किस जगह पर किया जाए इसे तय करने में काफी मदद देगी।

  • क्योंकि चंद्रयान मूल तौर पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के परीक्षण करने वाला था इसीलिए वैज्ञानिकों के द्वारा यह कयास लगाए जा रहे थे कि इस मिशन से चंद्रमा पर पानी तथा बर्फ होने के कुछ ठोस सबूत हाथ लगने वाले हैं।

लेकिन सब ठीक होते होते अचानक क्यों विफल हो गया विक्रम?

लॉन्चिंग के बाद से 6 सितंबर के रात तक चन्द्रयान-2 ने कमाल के प्रदर्शन किए थे। इसीलिए वैज्ञानिकों ने यह कयास लगाया था कि विक्रम की लैंडिंग भी शानदार होगी। लेकिन इस सपने को सबसे बड़ा धक्का तब लगा जब चंद्रमा के सतह से सिर्फ 21 किलोमीटर दूर विक्रम ने काम करना बंद कर दिया। शुरुआती तौर पर इसरो के वैज्ञानिकों को यह लगा था कि यह सिर्फ एक "कम्युनिकेशन ग्लिच" है जो कि किसी भी सॉफ्ट लैंडिंग में आम बात होती है। लेकिन जैसे जैसे रात बीतता गया वैसे वैसे यह स्पष्ट होता गया कि यह कोई सामान्य ग्लिच नहीं थी बल्कि विक्रम ने वाकई सॉफ्ट लैंडिंग कराने में चूक दी थी। यह बिल्कुल वैसा था जैसे सपने के सबसे खूबसूरत दृश्य तक पहुंचते ही जाग जाना। यह इसरो के वैज्ञानिकों के लिए एक बहुत बड़ा सदमा था।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विक्रम को आखिर हुआ क्या था? इसरो चेयरपर्सन डॉक्टर के.शिवन ने एक बार यह ज़रूर कहा था कि शायद विक्रम की क्रैश लैंडिंग हुई थी। लेकिन यह कितना सही है इसकी पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है।हालांकि नासा ने हाल ही में यह कहा था कि उसे पूरा यकीन है कि विक्रम क्रैश कर गया है। अगर हम मान ले कि विक्रम ने क्रैश-लैंड किया था तो फिर अगला सवाल यह है कि विक्रम ने क्रैश-लैंड किया क्यों?

आइए इस प्रश्न का उत्तर टटोला जाए……

विक्रम के विफलता के कई कारण हो सकते हैं।

निम्नलिखित इनमें से कुछ सबसे उज्जवल कारण है :

  • विक्रम चंद्रमा के जिस हिस्से में लैंड करने वाला था (यानी कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव) उसे लैंडिंग के लिए सबसे कठिन जगह माना जाता है। इसके कई कारण हैं। चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव के इस हिस्से में कई भरे भरे गड्ढे पाए जाते हैं। अगर कोई लैंडर इन गड्ढों की सही प्रकार से जांच नहीं कर पाता है तो इसके पूरे आसार हैं कि वह लैंडर इनमें से किसी एक गड्ढे पर गिर जाए और फिर कभी उससे बाहर ही ना आ पाए। विक्रम के लिए यह शक जायज़ इसलिए है क्योंकि लैंडिंग से ठीक पहले विक्रम अपने तय किए गए ट्रैजैक्ट्री से भटक गया था। अर्थात ऐसा हो सकता है कि विक्रम उसके तय किए गए सुरक्षित जगह से दूर किसी एक गड्ढे में गिर गया हो।

  • यदि हम यह मान भी लें कि विक्रम उसके तय किए गए रास्ते से ज्यादा दूर नहीं गया था उसके बाद भी यह सवाल तो बनता है कि चंद्रमा की सतह से 21 किलोमीटर दूर विक्रम ने सिग्नल भेजना बंद क्यों कर दिया? एक सबसे उज्जवल कारण यह हो सकता है कि चंद्रमा की सतह से 21 किलोमीटर दूर विक्रम किसी आंधी में फंस गया होगा जिसके कारण उसके कुछ अंश क्षतिग्रस्त हुए होंगे। यदि यह आंधी बहुत तीव्र हो तो ऐसा भी हो सकता है कि इस आंधी में फंसने के कारण विक्रम के अंदर कोड किए गए कृत्रिम बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया हो जिसके कारण विक्रम को यह समझ में नहीं आया कि लैंड करें तो करें कहां...

कारण चाहे जो भी हो यह एक कड़वा सत्य है कि विक्रम चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग करने में विफल रहा। लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं की चंद्रयान 2 का पूरा मिशन ही विफल हो गया हो। कई दृष्टि से चन्द्रयान-2 आज भी काफी सफल मिशन है। इसरो के चेयरपर्सन डॉक्टर के.शिवन का मानना है कि यह मिशन 95 फ़ीसदी सफल रहा है। इसका प्रमुख कारण है ऑरबिटर का सफलतापूर्वक काम करना। ऑरबिटर के सहारे हम अब भी ऐसे कई तथ्यों का परीक्षण कर सकते हैं जो पहले नहीं किए गए थे।

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वैज्ञानिक मिशन विफल हो इसमें कोई नई बात नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि हम इन विफलताओं से कितना सीखते हैं तथा इन विफलताओं से प्रेरणा लेकर कितना आगे बढ़ पाते हैं। डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने एक बार कहा था कि हर विफलता के आगे सफलता का रास्ता होता है। इसरो के वैज्ञानिकों को इस विफलता का ग़म तो है लेकिन वह आगे इस विफलता को सफलता में बदला जाए इसी दिशा में ध्यान पूर्वक कार्यरत है।

उनके इस प्रयास में पूरा देश उनके साथ है।

















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