श्री बगलामुखी माता चालीसा

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Anant Agarwal
Aug 19, 2019   •  2 views

॥ दोहा ॥
सिर नवाइ बगलामुखी,लिखूं चालीसा आज ॥
कृपा करहु मोपर सदा, पूरन हो मम काज ॥

॥ चौपाई ॥
जय जय जय श्री बगला माता । आदिशक्ति सब जग की त्राता ॥
बगला सम तब आनन माता । एहि ते भयउ नाम विख्याता ॥
शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी । असतुति करहिं देव नर-नारी ॥
पीतवसन तन पर तव राजै । हाथहिं मुद्गर गदा विराजै ॥ 4 ॥

तीन नयन गल चम्पक माला । अमित तेज प्रकटत है भाला ॥
रत्न-जटित सिंहासन सोहै । शोभा निरखि सकल जन मोहै ॥
आसन पीतवर्ण महारानी । भक्तन की तुम हो वरदानी ॥
पीताभूषण पीतहिं चन्दन । सुर नर नाग करत सब वन्दन ॥ 8 ॥

एहि विधि ध्यान हृदय में राखै । वेद पुराण संत अस भाखै ॥
अब पूजा विधि करौं प्रकाशा । जाके किये होत दुख-नाशा ॥
प्रथमहिं पीत ध्वजा फहरावै । पीतवसन देवी पहिरावै ॥
कुंकुम अक्षत मोदक बेसन । अबिर गुलाल सुपारी चन्दन ॥ 12 ॥

माल्य हरिद्रा अरु फल पाना । सबहिं चढ़इ धरै उर ध्याना ॥
धूप दीप कर्पूर की बाती । प्रेम-सहित तब करै आरती ॥
अस्तुति करै हाथ दोउ जोरे । पुरवहु मातु मनोरथ मोरे ॥
मातु भगति तब सब सुख खानी । करहुं कृपा मोपर जनजानी ॥ 16 ॥

त्रिविध ताप सब दुख नशावहु । तिमिर मिटाकर ज्ञान बढ़ावहु ॥
बार-बार मैं बिनवहुं तोहीं । अविरल भगति ज्ञान दो मोहीं ॥
पूजनांत में हवन करावै । सा नर मनवांछित फल पावै ॥
सर्षप होम करै जो कोई । ताके वश सचराचर होई ॥ 20 ॥

तिल तण्डुल संग क्षीर मिरावै । भक्ति प्रेम से हवन करावै ॥
दुख दरिद्र व्यापै नहिं सोई । निश्चय सुख-सम्पत्ति सब होई ॥
फूल अशोक हवन जो करई । ताके गृह सुख-सम्पत्ति भरई ॥
फल सेमर का होम करीजै । निश्चय वाको रिपु सब छीजै ॥ 24 ॥

गुग्गुल घृत होमै जो कोई । तेहि के वश में राजा होई ॥
गुग्गुल तिल संग होम करावै । ताको सकल बंध कट जावै ॥
बीलाक्षर का पाठ जो करहीं । बीज मंत्र तुम्हरो उच्चरहीं ॥
एक मास निशि जो कर जापा । तेहि कर मिटत सकल संतापा ॥ 28 ॥

घर की शुद्ध भूमि जहं होई । साध्का जाप करै तहं सोई ॥
सेइ इच्छित फल निश्चय पावै । यामै नहिं कदु संशय लावै ॥
अथवा तीर नदी के जाई । साधक जाप करै मन लाई ॥
दस सहस्र जप करै जो कोई । सक काज तेहि कर सिधि होई ॥ 32 ॥

जाप करै जो लक्षहिं बारा । ताकर होय सुयशविस्तारा ॥
जो तव नाम जपै मन लाई । अल्पकाल महं रिपुहिं नसाई ॥
सप्तरात्रि जो पापहिं नामा । वाको पूरन हो सब कामा ॥
नव दिन जाप करे जो कोई । व्याधि रहित ताकर तन होई ॥ 36 ॥

ध्यान करै जो बन्ध्या नारी । पावै पुत्रादिक फल चारी ॥
प्रातः सायं अरु मध्याना । धरे ध्यान होवैकल्याना ॥
कहं लगि महिमा कहौं तिहारी । नाम सदा शुभ मंगलकारी ॥
पाठ करै जो नित्या चालीसा । तेहि पर कृपा करहिं गौरीशा ॥ 40 ॥

॥ दोहा ॥
सन्तशरण को तनय हूं, कुलपति मिश्र सुनाम ।
हरिद्वार मण्डल बसूं, धाम हरिपुर ग्राम ॥

उन्नीस सौ पिचानबे सन् की, श्रावण शुक्ला मास ।
चालीसा रचना कियौ, तव चरणन को दास ॥

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