नर,नारी और भारतीय समाज का घिनौना चेहरा!

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राजू रंजन
Jul 14, 2019   •  4 views

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नर नारी और भारतीय समाज का घिनौना चेहरा।

एक अजीब विचित्र घिनौना शब्द जिससे सभी को नफरत है पर प्यार भी सब इसे उतना ही करते हैं सिवाय एक इंसान के- वो होता है लड़की का पिताशायद गर बुद्धिजीवियों द्वारा समता मूलक समाज और समानता सूचक विचार की रूपरेखा की गहरी नींव रखी जाती तो हमारा समाज रूढ़िवादी सोच का कभी शिकार ही नहीं होता।

भारतीय सभ्यता संस्कृति का ढिंढोरा खूब पिटा जाता है। हम महान ग्रंथों की ,गुरुओं की और इमारतों की खूब बातें करते है पर आज तक क्या हमने अपने कुरीतियों की बात की जिसमें हमारा स्थान अवल्ल है। यह त्रासदी ही रहा जो हम विभिन्न प्रसिद्ध ग्रंथों में भी उस लेखक का चेहरा से रू- ब -रू होते हैं जो महज मुगलों का पारसियों का अंग्रेजों का दलाल मात्र ही थे। वो किस आधार पर साहित्य को नई दिशा दे सकते है जबकि उनके विचार में स्वाधीनता नाम की कोई भी एहसास ही नही था।

समता समानता के भाव का हमारे समाज में वास हो, इसके लिये न जाने कितने लेखकों ने , साहित्यकारों ने , समाज सुधारकों ने और दार्शनिक विचारकों नेअपना प्रयत्न कर गये पर क्या मिला, कुछ भी तो नहीं।बोल लेखनी विचार सब किताबों के पन्ने तक ही सीमित रह गये।धर्म और जात के आड़ में हम इंसानों ने अपनी सीमायें तय कर ली । यह आपकी बात नहीं यह सबों की बात है, मेरी भी। हम सबों ने खुद को परतंत्रता का नायाब तोहफा सदियों से देते आये जो आज भी बदस्तूर जारी है।

कहते हैं जहाँ जिस समाज में नारियों का सम्मान न हो वह समाज कभी प्रेम करुणा का भाव लिये महान नही कहला सकता। मेरा भारत महान ,बिल्कुल। जहाँ नारियों को हमेशा कैद रखा गया। वासना की मूरत समझा गया , इस्तेमाल किया गया। वो कैद जानवर ही तो थी जिसे देवी का रूप देकर घर में प्रताड़ित किया गया। दहेज के खातिर कईयों को अपना जवानी पिता के घर में ही काटना पड़ता है। हम उसी समाज का हिस्सा है जहाँ उसे हर भावों से वंचित रखते हैं। उसके दोस्त नहीं हो सकते, वो लड़कों से मिले तो बदचलन और हम लड़कियों से मिलें तो वो हमारा पुरुषार्थ झलकाता है।

यह अजीब बिडम्बना है देश का जिसकी संस्कृति इतनी पुरानी और महान है पर जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। ग्रंथों के बोल वचन किसी का निजी विचार हो सकता है जिसके आधार पर हम महान नही कहला सकते। फिर क्यों हर सामाजिक कोढ़ को उसका कवच पहना महान बन जाते हैं,गांधी ,विवेकानन्द और कई महान सुधारकों के नाम के सहारे कब तक छुपा पाएंगे अपनी हर खामियों को।

तभी मुझे ग्रंथों किताबों में कुछ भी नया सीखने को नहीं मिलता। जो गर सिख पायेंगे तो वो समता मुलक और समानता सूचक खुद के ही विचारों में।

विधुर होने पर आप नर दुबारा घर बसा लो, रंगरंगेलिया मनाओ । और नारी को सदियों से प्रताड़ित करते आये । सफेद रंग का चंद उपहार सौंपते आये । क्या यह तेरा पुरुषार्थ था! और तो और उसे फिर कुलटा डायन की उपमा से नवाजते आये, क्या यह तेरा पुरुषार्थ था?उसके बच्चों को न जाने कैसे जीवन यापन करना पड़ता होगा, यह हम तुम क्या जानो।पति, एक पिता और भाई का गर साथ न हो तो यह समाज किस तरह लड़की औरत का शोषण और गलत इस्तेमाल करता है, यह किसी से छुपा नहीं। बस ट्रेन भीड़ शहर हर जगह तेरी गिद्ध सा नजर उसका पीछा करती हैं। उसे जरा छूने मात्र से न जाने कौन सा सुकून तुम सब पाते हो, जैसे अपने बहन और माँ को छूने से वो नही मिलता।

यह डर सताता है, वो हँसती नही। वो हम सब पर शक करती है क्योंकि उसका हँसना हम इशारा मान बैठते है अपने लिये और अपने तन के भूख को मिटाने वाला एक शुरुआती यंत्र समझ बैठते हैं। क्या सुंदरता क्या उसके गहने, उसके मादकता यौवन तेरे हैं, गर नहीं तो उन्हें क्यों नहीं खुल के जीने देते। क्यों बाध्य करते हो उन्हें ,सारे नर को एक जैसा मानने के लिये। हम नर भी सारे गलत नहीं, पर मानसिकता तो गलत होता ही है। इसमें बदलाव बोल भी ला सकता है विचार भी, और फिर रिश्ते में एक पवित्र नाम देकर हम उन्हें भी अपने समान दर्जा दे सकते है।

वो नारी कोई और नहीं मेरी माँ है मेरी बहन और मेरी बेटी है और मेरी दोस्त है वो। मेरे पास चारों है, मैं खुश हूं।

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